साहित्यशास्त्र
साहित्यशास्त्र
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मिथक, फैंटेसी, कल्पना, प्रतीक, बिम्ब → premium chapter · free preview · ~10 min · 4 practice questions
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काव्य के लक्षण, हेतु और प्रयोजन
High weightageकाव्य के लक्षण; काव्य हेतु; काव्य प्रयोजन।
प्रमुख संप्रदाय और सिद्धान्त
High weightageरस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति और औचित्य।
रस निष्पत्ति, साधारणीकरण, शब्दशक्ति
High weightageरस निष्पत्ति; साधारणीकरण; शब्दशक्ति; काव्यगुण; काव्य दोष।
पाश्चात्य काव्य सिद्धान्त
High weightageप्लेटो के काव्य सिद्धान्त; अरस्तू — अनुकरण सिद्धान्त, त्रासदी विवेचन, विरेचन सिद्धान्त; वर्ड्सवर्थ का काव्यभाषा सिद्धान्त; कॉलरिज — कल्पना और फैंटेसी; टी. एस. इलियट — निर्वैयक्तिकता का सिद्धान्त, परम्परा की अवधारणा; आई. ए. रिचर्ड्स — मूल्य सिद्धान्त, संप्रेषण सिद्धान्त, काव्य-भाषा सिद्धान्त।
मिथक, फैंटेसी, कल्पना, प्रतीक, बिम्ब
Mediumमिथक; फैंटेसी; कल्पना; प्रतीक; बिम्ब।
Comprehensive unit note · ~16 min read
साहित्यशास्त्र वह शास्त्र है जो साहित्य की रचना, उसके सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन करता है। साहित्य पढ़ना एक अनुभव है, परंतु साहित्यशास्त्र उस अनुभव को समझने की विधि देता है। जब हम पूछते हैं कि कोई कविता हमें क्यों अच्छी लगती है, कोई पंक्ति हमें क्यों छू जाती है, और कोई रचना हमें क्यों आनंद देती है, तब हम साहित्यशास्त्र के प्रश्नों से टकराते हैं। भारतीय साहित्यशास्त्र की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। उसमें रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति और औचित्य जैसे संप्रदायों ने काव्य के सौंदर्य को विभिन्न दृष्टियों से समझाया है। पाश्चात्य साहित्यशास्त्र ने भी अनुकरण, विरेचन, उदात्त, कल्पना और संरचना जैसे सिद्धांतों से साहित्य को समझने के नए मार्ग खोले हैं। इस इकाई में हम पहले काव्य के लक्षण, हेतु और प्रयोजन को समझेंगे, अर्थात काव्य क्या है, वह क्यों रचा जाता है, और उसका प्रयोजन क्या है। इसके बाद प्रमुख भारतीय संप्रदायों और सिद्धांतों का अध्ययन करेंगे। रस निष्पत्ति, साधारणीकरण और शब्दशक्ति जैसे विषय भारतीय काव्यशास्त्र के हृदय हैं। पाश्चात्य काव्य सिद्धांत, रूसी रूपवाद और नयी समीक्षा आधुनिक आलोचना की दृष्टियाँ हैं। अंत में मिथक, फैंटेसी, कल्पना, प्रतीक और बिंब जैसे तत्वों का अध्ययन करेंगे, जो आधुनिक कविता की भाषा को समझने के लिए आवश्यक हैं। इस इकाई को पढ़ते समय प्रत्येक सिद्धांत को उसकी परिभाषा, उसके प्रवर्तक, उसकी मुख्य स्थापना और उसकी सीमा के साथ याद करें।
Learning objectives
- काव्य के लक्षण, हेतु और प्रयोजन की भारतीय परंपरा को समझना।
- रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति और औचित्य संप्रदायों का तुलनात्मक परिचय प्राप्त करना।
- रस निष्पत्ति, साधारणीकरण और शब्दशक्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट करना।
- पाश्चात्य काव्य सिद्धांतों की मुख्य स्थापनाओं को जानना।
- रूसी रूपवाद और नयी समीक्षा की दृष्टि को समझना।
- मिथक, फैंटेसी, कल्पना, प्रतीक और बिंब के भेद और प्रयोग का मूल्यांकन करना।
Overview
साहित्यशास्त्र का अध्ययन दो परंपराओं में बँटा है, भारतीय और पाश्चात्य। भारतीय परंपरा में काव्य की आत्मा के प्रश्न पर लंबा विमर्श हुआ है। किसी ने रस को काव्य की आत्मा कहा, किसी ने अलंकार को, किसी ने रीति को, किसी ने ध्वनि को, किसी ने वक्रोक्ति को और किसी ने औचित्य को। ये सभी संप्रदाय एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि काव्य के विभिन्न पक्षों पर बल देते हैं। रस संप्रदाय भाव और आस्वाद पर बल देता है, अलंकार संप्रदाय सौंदर्यवर्धक तत्वों पर, रीति संप्रदाय शैली और गुणों पर, ध्वनि संप्रदाय व्यंग्यार्थ पर, वक्रोक्ति संप्रदाय उक्ति की वक्रता पर, और औचित्य संप्रदाय सभी तत्वों के उचित समन्वय पर। पाश्चात्य परंपरा में प्लेटो और अरस्तू से लेकर आधुनिक आलोचकों तक काव्य के अनुकरण, प्रभाव, संरचना और भाषा पर विमर्श हुआ है। आधुनिक काल में रूसी रूपवाद ने साहित्यिकता की खोज की, और नयी समीक्षा ने रचना को स्वायत्त पाठ के रूप में पढ़ने पर बल दिया। इन सभी दृष्टियों को एक साथ समझना आवश्यक है, क्योंकि परीक्षा में प्रायः सिद्धांत, प्रवर्तक और स्थापना के संबंध पर प्रश्न पूछे जाते हैं। इस अवलोकन के बाद अब हम प्रत्येक विषय को विस्तार से पढ़ेंगे।
काव्य के लक्षण, हेतु और प्रयोजन
काव्य के लक्षण का अर्थ है काव्य की परिभाषा, अर्थात वह क्या है जिससे कोई रचना काव्य कहलाती है। भारतीय आचार्यों ने काव्य के विभिन्न लक्षण दिए हैं। मम्मट ने काव्य को दोष रहित, गुण सहित और कभी-कभी अलंकार रहित शब्दार्थ का समुच्चय कहा है। इस परिभाषा में शब्द और अर्थ दोनों का महत्व है, दोषों से मुक्ति आवश्यक है, गुणों की उपस्थिति आवश्यक है, और अलंकार की अनिवार्यता नहीं है, क्योंकि कभी-कभी बिना अलंकार के भी काव्य हो सकता है। विश्वनाथ ने रसात्मक वाक्य को काव्य कहा है, अर्थात जिस वाक्य में रस की अनुभूति हो, वही काव्य है। इस परिभाषा में रस को केंद्र में रखा गया है। पंडितराज जगन्नाथ ने रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द को काव्य कहा है, अर्थात काव्य वह शब्द है जो रमणीय अर्थ का बोध कराए। इन परिभाषाओं में भेद होते हुए भी एक समानता है, सभी काव्य को सामान्य भाषा से अलग, सौंदर्यपूर्ण और अनुभूति प्रधान मानते हैं। काव्य हेतु का अर्थ है काव्य रचना के कारण। मम्मट ने तीन हेतु बताए हैं, शक्ति, निपुणता और अभ्यास। शक्ति का अर्थ है प्रतिभा, जो जन्मजात होती है। निपुणता का अर्थ है शास्त्र और लोक का ज्ञान, जो अध्ययन से प्राप्त होता है। अभ्यास का अर्थ है निरंतर रचना का अभ्यास, जो कवि को परिपक्व बनाता है। इन तीनों के समन्वय से ही श्रेष्ठ काव्य रचा जाता है। केवल प्रतिभा से काव्य अधूरा रहता है, केवल ज्ञान से वह शुष्क हो जाता है, और केवल अभ्यास से वह यांत्रिक हो जाता है। काव्य प्रयोजन का अर्थ है काव्य का उद्देश्य। मम्मट ने काव्य के कई प्रयोजन बताए हैं, जैसे यश की प्राप्ति, धन की प्राप्ति, व्यवहार का ज्ञान, अमंगल का नाश, आनंद की प्राप्ति और उपदेश। इनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रयोजन आनंद है, क्योंकि काव्य का आस्वाद ही उसका मुख्य फल है। परंतु काव्य केवल आनंद नहीं देता, वह जीवन का ज्ञान भी देता है, नैतिक उपदेश भी देता है, और समाज को संस्कारित भी करता है। आधुनिक दृष्टि से काव्य का प्रयोजन आत्माभिव्यक्ति, सामाजिक चेतना और सौंदर्यबोध का विकास भी है।
प्रमुख संप्रदाय और सिद्धान्त
भारतीय काव्यशास्त्र में छह प्रमुख संप्रदाय माने जाते हैं। रस संप्रदाय के प्रवर्तक भरतमुनि हैं, जिन्होंने नाट्यशास्त्र में रस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। रस का अर्थ है आस्वाद, अर्थात काव्य या नाटक को पढ़ने या देखने से जो आनंदमयी अनुभूति होती है, वही रस है। रस के आठ या नौ भेद माने जाते हैं, जिनमें शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत प्रमुख हैं। अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक भामह हैं, जिन्होंने अलंकार को काव्य का सौंदर्यवर्धक तत्व माना। अलंकार दो प्रकार के हैं, शब्दालंकार और अर्थालंकार। अनुप्रास, यमक और श्लेष शब्दालंकार हैं, और उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा अर्थालंकार हैं। रीति संप्रदाय के प्रवर्तक वामन हैं, जिन्होंने रीति को काव्य की आत्मा कहा। रीति का अर्थ है पदों की विशिष्ट रचना, अर्थात शैली। वामन ने तीन रीतियाँ बताईं, वैदर्भी, गौड़ी और पांचाली। गुणों, जैसे माधुर्य, ओज और प्रसाद, का भी रीति से संबंध है। ध्वनि संप्रदाय के प्रवर्तक आनंदवर्धन हैं, जिन्होंने ध्वनि को काव्य की आत्मा कहा। ध्वनि का अर्थ है व्यंग्यार्थ, अर्थात शब्द के अभिधा और लक्षणा से परे जो अर्थ ध्वनित होता है, वही काव्य का प्राण है। ध्वनि के तीन भेद हैं, वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि और रस ध्वनि, जिनमें रस ध्वनि श्रेष्ठ मानी जाती है। वक्रोक्ति संप्रदाय के प्रवर्तक कुंतक हैं, जिन्होंने वक्रोक्ति को काव्य का जीवन कहा। वक्रोक्ति का अर्थ है उक्ति की वक्रता, अर्थात सामान्य कथन से भिन्न, चमत्कारपूर्ण कथन। औचित्य संप्रदाय के प्रवर्तक क्षेमेंद्र हैं, जिन्होंने औचित्य को काव्य का प्राण कहा। औचित्य का अर्थ है सभी तत्वों का उचित स्थान पर प्रयोग, जैसे रस, अलंकार, गुण और रीति का प्रसंग के अनुसार होना। इन संप्रदायों का तुलनात्मक अध्ययन परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रश्न प्रायः पूछता है कि किस संप्रदाय ने काव्य की आत्मा किसे कहा।
रस निष्पत्ति, साधारणीकरण, शब्दशक्ति
रस निष्पत्ति का प्रश्न यह है कि रस कैसे उत्पन्न होता है। भरतमुनि का प्रसिद्ध सूत्र है कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। विभाव का अर्थ है वे कारण जो भाव को जगाते हैं, जैसे नायक, नायिका, प्रकृति और परिस्थिति। अनुभाव का अर्थ है भाव के बाह्य लक्षण, जैसे आँसू, कंप, स्वेद और हावभाव। व्यभिचारी भाव का अर्थ है संचारी भाव, जो स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं, जैसे चिंता, हर्ष, विषाद और स्मृति। स्थायी भाव ही रस का आधार है, जैसे रति से शृंगार, हास से हास्य, शोक से करुण, क्रोध से रौद्र, उत्साह से वीर, भय से भयानक, जुगुप्सा से बीभत्स, विस्मय से अद्भुत और निर्वेद से शांत रस बनता है। रस निष्पत्ति की व्याख्या पर विभिन्न आचार्यों के मत हैं। भट्ट लोल्लट ने उत्पत्तिवाद का सिद्धांत दिया, जिसमें रस की उत्पत्ति अनुकार्य में मानी जाती है। शंकुक ने अनुमितिवाद दिया, जिसमें रस का अनुमान किया जाता है। भट्ट नायक ने भुक्तिवाद दिया, जिसमें रस का भोग किया जाता है, और अभिनवगुप्त ने अभिव्यक्तिवाद दिया, जिसमें रस की अभिव्यक्ति होती है। अभिनवगुप्त का मत सर्वाधिक मान्य है, क्योंकि इसमें रस को पाठक या दर्शक की चेतना में अभिव्यक्त माना जाता है। साधारणीकरण का सिद्धांत भट्ट नायक से जुड़ा है। साधारणीकरण का अर्थ है कि काव्य में व्यक्तिगत भाव सामान्य हो जाता है, अर्थात पाठक अपने व्यक्तिगत संबंधों से मुक्त होकर भाव का सामान्य आस्वाद करता है। जब हम किसी कविता में प्रेम का वर्णन पढ़ते हैं, तब हम अपने प्रेमी या प्रेमिका के बारे में नहीं सोचते, बल्कि प्रेम के सामान्य भाव का आस्वाद करते हैं, यही साधारणीकरण है। शब्दशक्ति का अर्थ है शब्द की अर्थ बोध कराने की शक्ति। शब्द की तीन शक्तियाँ हैं, अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। अभिधा से शब्द का मुख्य अर्थ बोध होता है, लक्षणा से मुख्य अर्थ में बाधा होने पर संबंधित अर्थ बोध होता है, और व्यंजना से ध्वनित अर्थ बोध होता है। उदाहरण के लिए गंगा में घर है में अभिधा से अर्थ नहीं बनता, इसलिए लक्षणा से गंगा के किनारे घर है अर्थ लिया जाता है। व्यंजना से जो अर्थ ध्वनित होता है, वह काव्य का प्राण है।
पाश्चात्य काव्य सिद्धान्त
पाश्चात्य काव्य सिद्धांत की परंपरा प्लेटो और अरस्तू से शुरू होती है। प्लेटो ने काव्य को अनुकरण का अनुकरण कहा और उसे सत्य से दूर माना, क्योंकि उनके अनुसार काव्य विचारों के जगत की अनुकृति है, और अनुकृति सत्य से दोहरी दूरी पर होती है। प्लेटो ने कवियों को आदर्श राज्य से निकालने की बात भी कही, क्योंकि काव्य भावनाओं को भड़काता है। अरस्तू ने प्लेटो का खंडन किया और काव्य को अनुकरण का सृजनात्मक रूप माना। अरस्तू के अनुसार काव्य केवल यथार्थ की नकल नहीं करता, बल्कि वह यथार्थ के सार्वभौमिक सत्य को प्रस्तुत करता है। अरस्तू ने विरेचन का सिद्धांत दिया, जिसमें त्रासदी के माध्यम से करुणा और भय की भावनाओं का शोधन होता है। लोंजाइनस ने उदात्त का सिद्धांत दिया, जिसमें काव्य की महानता, गरिमा और प्रभाव पर बल दिया गया। उदात्त वह तत्व है जो पाठक को विस्मित करता है और उसे ऊँचाई का अनुभव कराता है। रोमांटिक युग में वर्ड्सवर्थ ने कविता को प्रबल भावनाओं का सहज उच्छलन कहा, और कॉलरिज ने कल्पना को काव्य की सृजनात्मक शक्ति माना। कॉलरिज ने कल्पना और फैंसी में भेद किया, कल्पना सृजनात्मक और एकीकरण करने वाली है, जबकि फैंसी केवल संयोजन करने वाली है। मैथ्यू आर्नल्ड ने कविता को जीवन की आलोचना कहा। टी एस इलियट ने निर्वैयक्तिकता का सिद्धांत दिया, जिसमें कवि के व्यक्तित्व का लोप और परंपरा की चेतना पर बल दिया गया। इलियट के अनुसार कविता व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व से पलायन है। पाश्चात्य सिद्धांतों का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय रस सिद्धांत और पाश्चात्य विरेचन सिद्धांत में समानता है, दोनों ही भावों के शोधन और आस्वाद से जुड़े हैं, परंतु उनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि भिन्न है।
रूसी रूपवाद और नयी समीक्षा
रूसी रूपवाद बीसवीं शताब्दी के आरंभ में रूस में विकसित हुआ एक आलोचना आंदोलन है। इसके प्रमुख विचारकों में शिक्लोव्स्की, याकॉब्सन और आइखेनबाम आते हैं। रूसी रूपवादियों का मुख्य प्रश्न यह था कि साहित्य को साहित्य क्या बनाता है, अर्थात साहित्यिकता क्या है। उनका उत्तर था कि साहित्यिकता भाषा के विशेष प्रयोग में है, जिसे उन्होंने विचलन और अजनबीकरण कहा। अजनबीकरण का अर्थ है परिचित वस्तु को अपरिचित रूप में प्रस्तुत करना, ताकि पाठक उसे नए सिरे से देखे। उदाहरण के लिए जब कवि सामान्य वस्तु का असामान्य वर्णन करता है, तब पाठक की आदत टूटती है और वह वस्तु को नए रूप में अनुभव करता है। रूसी रूपवादियों ने कथानक और कथा में भेद किया। कथा घटनाओं का कालक्रम है, और कथानक उन घटनाओं की कलात्मक व्यवस्था है। उन्होंने साहित्य के इतिहास को भी रूपों के परिवर्तन के रूप में देखा, न कि केवल विचारों के इतिहास के रूप में। नयी समीक्षा अमेरिका में विकसित हुई एक आलोचना पद्धति है, जिसके प्रमुख विचारकों में रिचर्ड्स, एम्पसन, रैंसम, ब्रुक्स और विमसाट आते हैं। नयी समीक्षा का मुख्य सिद्धांत यह है कि रचना को स्वायत्त पाठ के रूप में पढ़ा जाए, और उसके अर्थ को रचना के भीतर ही खोजा जाए। नयी समीक्षा ने दो भ्रांतियों का विरोध किया, भावात्मक भ्रांति और आशय भ्रांति। भावात्मक भ्रांति का अर्थ है रचना का मूल्यांकन पाठक के भाव पर आधारित करना, और आशय भ्रांति का अर्थ है रचना का अर्थ लेखक के आशय से तय करना। नयी समीक्षा के अनुसार रचना का अर्थ न तो पाठक के भाव से तय होता है, न लेखक के आशय से, बल्कि रचना की संरचना, विडंबना, तनाव और विरोधाभास से तय होता है। ब्रुक्स ने कविता को विरोधाभासों का संतुलन कहा। नयी समीक्षा की सीमा यह है कि वह रचना को उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ से अलग कर देती है, परंतु उसकी उपलब्धि यह है कि उसने पाठ के सूक्ष्म विश्लेषण की विधि दी।
मिथक, फैंटेसी, कल्पना, प्रतीक, बिम्ब
मिथक, फैंटेसी, कल्पना, प्रतीक और बिंब आधुनिक साहित्य की भाषा के महत्वपूर्ण तत्व हैं। मिथक का अर्थ है वह प्राचीन कथा जो किसी समाज की सामूहिक चेतना में बसी होती है और जिसमें मानव जीवन के मूल प्रश्नों, जैसे जन्म, मृत्यु, प्रेम, युद्ध और प्रकृति, का प्रतीकात्मक उत्तर होता है। मिथक केवल प्राचीन कथा नहीं है, वह एक संरचना है जिसे आधुनिक लेखक नए संदर्भों में पुनः प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए राम, कृष्ण, सीता और अन्य पौराणिक पात्रों का प्रयोग आधुनिक कविता में मिथक के रूप में होता है, जहाँ पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक प्रश्नों पर टिप्पणी की जाती है। फैंटेसी का अर्थ है कल्पना की वह उड़ान जिसमें यथार्थ के नियमों को तोड़कर एक नया जगत रचा जाता है। फैंटेसी में जादू, अलौकिक प्राणी और असंभव घटनाएँ होती हैं, परंतु उसके भीतर अपनी तर्कसंगति होती है। फैंटेसी केवल मनोरंजन नहीं है, वह यथार्थ की आलोचना का भी माध्यम हो सकती है। कल्पना साहित्य की मूल सृजनात्मक शक्ति है। कॉलरिज के अनुसार कल्पना विभिन्न तत्वों को एकीकृत करके नया रूप देती है, जबकि फैंसी केवल तत्वों को जोड़ती है। प्रतीक का अर्थ है वह वस्तु, शब्द या चित्र जो अपने सामान्य अर्थ से परे किसी अन्य अर्थ का बोध कराए। उदाहरण के लिए कमल पवित्रता का प्रतीक है, दीपक ज्ञान का प्रतीक है, और अंधकार अज्ञान का प्रतीक है। प्रतीक का अर्थ संदर्भ पर निर्भर करता है, और एक ही प्रतीक विभिन्न रचनाओं में विभिन्न अर्थ दे सकता है। बिंब का अर्थ है वह चित्र जो कविता में शब्दों के माध्यम से बनता है और पाठक की इंद्रियों को जगाता है। बिंब दृश्य, श्रव्य, स्पर्श, गंध और स्वाद से जुड़ा हो सकता है। बिंब की विशेषता यह है कि वह अमूर्त भाव को मूर्त रूप देता है। प्रतीक और बिंब में भेद यह है कि प्रतीक का अर्थ स्थिर और सांस्कृतिक होता है, जबकि बिंब का प्रभाव इंद्रियगत और तात्कालिक होता है। आधुनिक कविता में बिंब और प्रतीक का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आधुनिक कवि सीधे कथन की बजाय बिंब और प्रतीक के माध्यम से भाव व्यक्त करते हैं।
Key definitions
- रस: काव्य या नाटक के आस्वाद से उत्पन्न होने वाली आनंदमयी अनुभूति, जो विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से निष्पन्न होती है।
- ध्वनि: शब्द के अभिधा और लक्षणा से परे ध्वनित होने वाला अर्थ, जिसे आनंदवर्धन ने काव्य की आत्मा कहा है।
- साधारणीकरण: काव्य में व्यक्तिगत भाव का सामान्य हो जाना, जिससे पाठक अपने व्यक्तिगत संबंधों से मुक्त होकर भाव का आस्वाद करता है।
- अभिधा: शब्द की वह शक्ति जिससे उसका मुख्य अर्थ बोध होता है।
- लक्षणा: शब्द की वह शक्ति जिससे मुख्य अर्थ में बाधा होने पर संबंधित अर्थ बोध होता है।
- व्यंजना: शब्द की वह शक्ति जिससे ध्वनित अर्थ बोध होता है, जो काव्य का प्राण है।
- अजनबीकरण: रूसी रूपवाद का सिद्धांत, जिसमें परिचित वस्तु को अपरिचित रूप में प्रस्तुत करके पाठक की आदत तोड़ी जाती है।
- प्रतीक: वह वस्तु या शब्द जो अपने सामान्य अर्थ से परे किसी अन्य अर्थ का बोध कराए।
- बिंब: शब्दों के माध्यम से बना वह चित्र जो पाठक की इंद्रियों को जगाता है और अमूर्त भाव को मूर्त रूप देता है।
Worked examples
Example 1: गंगा में घर है वाक्य में कौन सी शब्दशक्ति काम कर रही है, समझाइए।
गंगा में घर है में अभिधा से अर्थ नहीं बनता, क्योंकि गंगा के जल में घर नहीं हो सकता। इसलिए लक्षणा से अर्थ लिया जाता है कि गंगा के किनारे घर है। यहाँ मुख्य अर्थ में बाधा है और संबंधित अर्थ ग्रहण किया गया है, इसलिए लक्षणा शब्दशक्ति काम कर रही है।
Example 2: रस निष्पत्ति के सूत्र को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
भरतमुनि के सूत्र के अनुसार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस निष्पन्न होता है। शृंगार रस में नायक और नायिका विभाव हैं, कटाक्ष और मुस्कान अनुभाव हैं, हर्ष और चिंता संचारी भाव हैं, और रति स्थायी भाव है। इन सबके संयोग से पाठक को शृंगार रस का आस्वाद होता है।
Example 3: काव्य की आत्मा के प्रश्न पर रस और ध्वनि संप्रदाय में क्या अंतर है?
रस संप्रदाय के अनुसार काव्य की आत्मा रस है, अर्थात आस्वाद। ध्वनि संप्रदाय के अनुसार काव्य की आत्मा ध्वनि है, अर्थात व्यंग्यार्थ। दोनों में अंतर यह है कि रस भाव के आस्वाद पर बल देता है, जबकि ध्वनि अर्थ के ध्वनन पर बल देता है, परंतु रस ध्वनि को ध्वनि संप्रदाय में भी श्रेष्ठ माना गया है।
भारतीय काव्य संप्रदाय और आत्मा
| संप्रदाय | प्रवर्तक | काव्य की आत्मा |
|---|---|---|
| रस | भरतमुनि | रस |
| अलंकार | भामह | अलंकार |
| रीति | वामन | रीति |
| ध्वनि | आनंदवर्धन | ध्वनि |
| वक्रोक्ति | कुंतक | वक्रोक्ति |
| औचित्य | क्षेमेंद्र | औचित्य |
शब्दशक्ति के भेद
| शक्ति | अर्थ | उदाहरण की प्रकृति |
|---|---|---|
| अभिधा | मुख्य अर्थ | सीधा और सामान्य अर्थ |
| लक्षणा | संबंधित अर्थ | मुख्य अर्थ में बाधा होने पर |
| व्यंजना | ध्वनित अर्थ | अभिधा और लक्षणा से परे अर्थ |
Diagrams (described)
रस निष्पत्ति का आरेख: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव तीनों का तीर स्थायी भाव की ओर, और स्थायी भाव से रस की ओर, जिसमें प्रत्येक तत्व का उदाहरण नीचे लिखा हो।
शब्दशक्ति का त्रिभुज आरेख: शीर्ष पर शब्द, नीचे तीन कोने अभिधा, लक्षणा और व्यंजना, प्रत्येक के साथ एक-एक उदाहरण।
Exam points
- मम्मट ने काव्य को दोष रहित, गुण सहित शब्दार्थ कहा है, और विश्वनाथ ने रसात्मक वाक्य को काव्य कहा है।
- काव्य हेतु तीन हैं, शक्ति, निपुणता और अभ्यास, और काव्य का मुख्य प्रयोजन आनंद है।
- रस के प्रवर्तक भरतमुनि, अलंकार के भामह, रीति के वामन, ध्वनि के आनंदवर्धन, वक्रोक्ति के कुंतक और औचित्य के क्षेमेंद्र हैं।
- रस निष्पत्ति का सूत्र विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव का संयोग है।
- साधारणीकरण भट्ट नायक से जुड़ा है, और अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद सर्वाधिक मान्य है।
- अरस्तू ने विरेचन का सिद्धांत दिया, और लोंजाइनस ने उदात्त का सिद्धांत दिया।
- रूसी रूपवाद में साहित्यिकता और अजनबीकरण प्रमुख हैं, नयी समीक्षा में आशय भ्रांति और भावात्मक भ्रांति का विरोध है।
- प्रतीक का अर्थ सांस्कृतिक और स्थिर होता है, बिंब का प्रभाव इंद्रियगत और तात्कालिक होता है।
Common mistakes
- काव्य की आत्मा के प्रश्न में संप्रदाय और प्रवर्तक को मिलाना भूल है, प्रत्येक संप्रदाय का प्रवर्तक अलग है।
- अभिधा, लक्षणा और व्यंजना को एक ही मानना भूल है, तीनों की प्रक्रिया अलग है।
- साधारणीकरण को सामान्यीकरण समझना भूल है, वह व्यक्तिगत भाव का सामान्य आस्वाद है।
- रूसी रूपवाद को केवल रूप की पूजा समझना भूल है, वह साहित्यिकता की खोज है।
- प्रतीक और बिंब को एक ही मानना भूल है, प्रतीक अर्थ प्रधान है, बिंब चित्र प्रधान है।
Practice questions from this note (original practice — not official PYQs)
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Quick revision: इस इकाई का सार यह है कि काव्य की आत्मा के प्रश्न पर विभिन्न संप्रदायों ने विभिन्न उत्तर दिए हैं, परंतु सभी काव्य को सौंदर्य और अनुभूति से जोड़ते हैं। रस, ध्वनि, रीति, अलंकार, वक्रोक्ति और औचित्य के प्रवर्तकों को एक तालिका में याद करें। रस निष्पत्ति, साधारणीकरण और शब्दशक्ति की प्रक्रिया को उदाहरण सहित दोहराएँ। पाश्चात्य सिद्धांतों में प्लेटो, अरस्तू, लोंजाइनस और इलियट के नाम तथा उनकी स्थापनाओं को अलग-अलग याद करें। रूसी रूपवाद और नयी समीक्षा के भेद को स्पष्ट रखें, और प्रतीक तथा बिंब के अंतर को उदाहरण से समझें।
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