हिन्दी नाटक
हिन्दी नाटक
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भारतेन्दु
High weightageभारतेन्दु — अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा।
प्रसाद
High weightageजयशंकर प्रसाद — चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।
आधुनिक नाटक
High weightageधर्मवीर भारती — अंधायुग; लक्ष्मीनारायण लाल — सिंदूर की होली; मोहन राकेश — आधे-अधूरे, आषाढ़ का एक दिन।
समकालीन नाटक
Mediumहबीब तनवीर — आगरा बाज़ार; सर्वेश्वरदयाल सक्सेना — बकरी; शंकर शेष — एक और द्रोणाचार्य; उपेन्द्रनाथ अश्क — अंजो दीदी; मन्नू भंडारी — महाभोज।
Comprehensive unit note · ~11 min read
नाटक साहित्य की वह विधा है जो मंचन के लिए लिखी जाती है। नाटक में कथा, पात्र, संवाद, संघर्ष और मंचन सभी एक साथ काम करते हैं। नाटक का पाठक केवल पढ़ता नहीं है, वह दर्शक भी बनता है, और नाटक का प्रभाव केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अभिनय, मंच सज्जा, प्रकाश और ध्वनि से भी बनता है। हिन्दी नाटक का विकास भारतेन्दु से शुरू होता है, प्रसाद के साथ वह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ऊँचाई पर पहुँचता है, आधुनिक काल में वह सामाजिक यथार्थ और प्रयोग की ओर मुड़ता है, और समकालीन काल में वह दलित, स्त्री, आदिवासी और व्यवस्था की विसंगतियों के प्रश्नों से जुड़ता है। इस इकाई में हम भारतेन्दु, प्रसाद, आधुनिक और समकालीन नाटक का अलग-अलग अध्ययन करेंगे। प्रत्येक चरण के नाटकों की विशेषताओं, प्रमुख नाटककारों, प्रमुख नाटकों और उनके विषयों को पढ़ेंगे। नाटक का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि नाटक केवल साहित्य नहीं है, वह मंच कला भी है, इसलिए नाटक की संरचना, संवाद और मंचन की संभावनाओं को एक साथ समझना आवश्यक है।
Learning objectives
- हिन्दी नाटक की शुरुआत और भारतेन्दु युग की विशेषताओं को समझना।
- प्रसाद के नाटकों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना को जानना।
- आधुनिक नाटक की प्रवृत्तियों और प्रमुख नाटककारों का परिचय प्राप्त करना।
- समकालीन नाटक के विषयों और संवेदनाओं का मूल्यांकन करना।
- नाटक की संरचना, संवाद, पात्र और मंचन की विशेषताओं को समझना।
- नाटककार, नाटक और विषय के बीच संबंध स्थापित करना।
Overview
हिन्दी नाटक के विकास को चार चरणों में देखा जा सकता है। पहला चरण भारतेन्दु युग का है, जिसमें नाटक समाज सुधार, राष्ट्रीय चेतना और हास्य व्यंग्य का माध्यम बना। दूसरा चरण प्रसाद युग का है, जिसमें नाटक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा, और उसकी भाषा तथा शिल्प में गंभीरता आई। तीसरा चरण आधुनिक नाटक का है, जिसमें नाटक सामाजिक यथार्थ, मनोविज्ञान और प्रयोग की ओर मुड़ा। चौथा चरण समकालीन नाटक का है, जिसमें नाटक दलित, स्त्री, आदिवासी, पर्यावरण और व्यवस्था की विसंगतियों के प्रश्नों से जुड़ा। नाटक की संरचना में कथानक, पात्र, संवाद, संघर्ष, अंक और दृश्य महत्वपूर्ण हैं। कथानक नाटक की घटनाओं का क्रम है, पात्र उसके प्राण हैं, संवाद उसकी जीवंतता है, संघर्ष उसकी ऊर्जा है, और अंक तथा दृश्य उसकी मंचीय व्यवस्था है। नाटक की भाषा में संवाद की सहजता, पात्र के अनुसार भाषा का भेद, और मंचन की संभावना का ध्यान रखना आवश्यक है। हिन्दी नाटक का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि नाटक का मूल्यांकन केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि मंचन की कल्पना से भी होता है। इस अवलोकन के बाद अब हम प्रत्येक विषय को विस्तार से पढ़ेंगे।
भारतेन्दु
भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिन्दी नाटक के जनक माने जाते हैं। उन्होंने हिन्दी नाटक को नई दिशा दी, और नाटक को समाज सुधार तथा राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाया। भारतेन्दु के नाटकों में भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी और सत्य हरिश्चंद्र प्रमुख हैं। भारत दुर्दशा में भारत की दुर्दशा, अर्थात औपनिवेशिक शासन, गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों का चित्रण है। इस नाटक में भारत की दुर्दशा को एक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और उसके माध्यम से जनता को जगाने का प्रयास किया गया है। अंधेर नगरी में व्यवस्था की विसंगतियों, न्याय की विडंबना और भ्रष्टाचार का हास्यपूर्ण तथा व्यंग्यपूर्ण चित्रण है। अंधेर नगरी की प्रसिद्ध पंक्ति अंधेर नगरी चौपट राजा आज भी व्यवस्था की आलोचना के लिए प्रयोग की जाती है। सत्य हरिश्चंद्र में सत्य, धर्म और त्याग की कथा है, जिसमें राजा हरिश्चंद्र के सत्य पालन का वर्णन है। भारतेन्दु के नाटकों की विशेषता यह है कि वे मंचन योग्य हैं, उनकी भाषा सरल और संवाद सहज हैं, और उनमें लोक नाट्य की परंपरा, जैसे नौटंकी और रामलीला, का प्रभाव है। भारतेन्दु ने नाटक के माध्यम से जनसामान्य को जगाने का काम किया, और हिन्दी पत्रकारिता के साथ नाटक को भी राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाया। भारतेन्दु युग के अन्य नाटककारों में प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट और राधाकृष्ण दास आते हैं। भारतेन्दु के नाटकों की सीमा यह थी कि उनकी संरचना अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी, परंतु उनका महत्व यह है कि उन्होंने हिन्दी नाटक की नींव रखी और उसे समाज से जोड़ा।
प्रसाद
जयशंकर प्रसाद हिन्दी नाटक के सबसे महान नाटककार माने जाते हैं। प्रसाद के नाटकों में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना की प्रधानता है। उनके प्रमुख नाटकों में चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु और जनमेजय का नागयज्ञ आते हैं। चंद्रगुप्त में चंद्रगुप्त मौर्य, चाणक्य और विदेशी आक्रमण के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता का चित्रण है। इस नाटक में चाणक्य की बुद्धिमत्ता, चंद्रगुप्त की वीरता और अलका की देशभक्ति का वर्णन है। स्कंदगुप्त में गुप्त काल के हूण आक्रमण और राष्ट्रीय रक्षा का चित्रण है। ध्रुवस्वामिनी में स्त्री की स्वतंत्रता, विवाह और आत्मसम्मान का प्रश्न केंद्रीय है। ध्रुवस्वामिनी एक ऐसी स्त्री है जो अपने पति के कायरता के विरुद्ध विद्रोह करती है और अपने अधिकार की माँग करती है। यह नाटक स्त्री प्रश्न की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अजातशत्रु में बौद्ध काल की पृष्ठभूमि, अहिंसा और करुणा का चित्रण है। प्रसाद के नाटकों की भाषा संस्कृतनिष्ठ, काव्यात्मक और गंभीर है। उनके नाटकों में गीतों का प्रयोग होता है, और उनकी संरचना में ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से आधुनिक प्रश्नों पर टिप्पणी की जाती है। प्रसाद के नाटकों की आलोचना यह की जाती है कि वे मंचन की दृष्टि से कठिन हैं, क्योंकि उनकी भाषा कठिन है और उनकी संरचना लंबी है। परंतु उनकी उपलब्धि यह है कि उन्होंने हिन्दी नाटक को ऐतिहासिक गहराई, सांस्कृतिक चेतना और दार्शनिक गंभीरता दी। प्रसाद के नाटकों में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव और मानवीय मूल्यों का मेल है, और यही कारण है कि वे हिन्दी नाटक के शिखर माने जाते हैं।
आधुनिक नाटक
आधुनिक नाटक से तात्पर्य है प्रसाद के बाद के हिन्दी नाटक, जिसमें सामाजिक यथार्थ, मनोविज्ञान और प्रयोग की प्रधानता हुई। आधुनिक नाटक के प्रमुख नाटककारों में मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीनारायण लाल, जगदीशचंद्र माथुर और भुवनेश्वर आते हैं। मोहन राकेश आधुनिक हिन्दी नाटक के सबसे महत्वपूर्ण नाटककार हैं। उनके प्रमुख नाटकों में आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे अधूरे आते हैं। आषाढ़ का एक दिन में कालिदास और मल्लिका के प्रेम, त्याग और सृजन के द्वंद्व का चित्रण है। लहरों के राजहंस में नंद और सुंदरी के माध्यम से भोग और त्याग के द्वंद्व का चित्रण है। आधे अधूरे में मध्यवर्गीय परिवार के विघटन, स्त्री पुरुष संबंधों की जटिलता और आधुनिक जीवन की अधूरी आकांक्षाओं का चित्रण है। आधे अधूरे की विशेषता यह है कि उसमें एक ही पुरुष पात्र कई रूपों में आता है, जो स्त्री के जीवन में आए विभिन्न पुरुषों का प्रतीक है। धर्मवीर भारती का अंधा युग महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित गीति नाट्य है, जिसमें युद्ध की त्रासदी, नैतिक संकट और मानवीय मूल्यों का प्रश्न केंद्रीय है। अंधा युग की भाषा काव्यात्मक है, और उसकी संरचना में गीत, संवाद और मंचन का मेल है। लक्ष्मीनारायण लाल के नाटकों में सामाजिक यथार्थ और लोक जीवन का चित्रण है। जगदीशचंद्र माथुर के नाटकों में ऐतिहासिक और सामाजिक चेतना का मेल है। आधुनिक नाटक की भाषा सहज, संवाद प्रधान और मंचन योग्य है। आधुनिक नाटक की विशेषता यह है कि उसमें प्रसाद की ऐतिहासिक गंभीरता तो बनी रही, परंतु साथ ही आधुनिक जीवन की जटिलता, मनोविज्ञान और प्रयोग भी जुड़ गए।
समकालीन नाटक
समकालीन नाटक से तात्पर्य है वर्तमान समय के हिन्दी नाटक, जिसमें दलित, स्त्री, आदिवासी, पर्यावरण, सांप्रदायिकता और व्यवस्था की विसंगतियों के प्रश्न प्रमुख हैं। समकालीन नाटक की विशेषता यह है कि वह केवल मंच तक सीमित नहीं है, वह नुक्कड़ नाटक, जन नाटक और आंदोलन से भी जुड़ा हुआ है। नुक्कड़ नाटक में नाटक सड़कों, चौराहों और जनसभाओं में प्रस्तुत किया जाता है, और उसका लक्ष्य जनसामान्य को जगाना होता है। समकालीन नाटककारों में सफदर हाशमी, हबीब तनवीर, ब. व. कारंत और अन्य रंगकर्मी आते हैं। सफदर हाशमी ने जन नाट्य मंच के माध्यम से नुक्कड़ नाटक को लोकप्रिय बनाया। उनके नाटकों में मजदूर, किसान, स्त्री और सामान्य जन के प्रश्न केंद्रीय हैं। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य परंपरा को हिन्दी नाटक से जोड़ा और लोक कलाकारों के साथ काम किया। उनके नाटकों में लोक जीवन, लोक भाषा और लोक संगीत का मेल है। समकालीन नाटक में स्त्री नाटककारों का योगदान भी महत्वपूर्ण है, जिनमें स्त्री की स्वतंत्रता, शरीर, हिंसा और आत्मसम्मान के प्रश्न केंद्रीय हैं। दलित नाटक में जाति, अपमान, संघर्ष और आत्मसम्मान का चित्रण होता है। समकालीन नाटक की भाषा में लोक भाषा, बोलचाल और प्रयोगशीलता का मेल है। समकालीन नाटक की संरचना में परंपरागत अंक और दृश्य की व्यवस्था के साथ नए प्रयोग भी होते हैं, जैसे एक पात्र का कई रूपों में आना, दर्शकों से सीधा संवाद, और मंचन में लोक तत्वों का प्रयोग। समकालीन नाटक का महत्व यह है कि उसने नाटक को केवल साहित्य से निकालकर आंदोलन और जनचेतना का माध्यम बनाया है।
Key definitions
- नाटक: साहित्य की वह विधा जो मंचन के लिए लिखी जाती है, जिसमें कथा, पात्र, संवाद, संघर्ष और मंचन एक साथ काम करते हैं।
- गीति नाट्य: वह नाटक जिसमें गीत, काव्य और संवाद का मेल होता है, जैसे अंधा युग।
- नुक्कड़ नाटक: वह नाटक जो सड़कों, चौराहों और जनसभाओं में प्रस्तुत किया जाता है और जनचेतना जगाना उसका लक्ष्य होता है।
- संघर्ष: नाटक की वह ऊर्जा जो पात्रों, विचारों या परिस्थितियों के बीच टकराव से उत्पन्न होती है।
- अंक: नाटक का बड़ा भाग, जिसमें कई दृश्य हो सकते हैं।
- दृश्य: नाटक का छोटा भाग, जिसमें एक स्थान और एक समय की घटना प्रस्तुत की जाती है।
- संवाद: नाटक में पात्रों के बीच होने वाली बातचीत, जो कथा को आगे बढ़ाती है और पात्रों का चरित्र प्रकट करती है।
- मंचन: नाटक को मंच पर प्रस्तुत करने की प्रक्रिया, जिसमें अभिनय, मंच सज्जा, प्रकाश और ध्वनि शामिल हैं।
Worked examples
Example 1: अंधेर नगरी में व्यवस्था की आलोचना कैसे हुई है?
अंधेर नगरी में एक ऐसी नगरी का चित्रण है जहाँ न्याय की बजाय मूर्खता चलती है, और निर्दोष व्यक्ति को फाँसी की सजा दी जाती है। इस हास्यपूर्ण चित्रण के माध्यम से भारतेन्दु ने व्यवस्था की विसंगतियों, भ्रष्टाचार और न्याय की विडंबना की आलोचना की है। अंधेर नगरी चौपट राजा की पंक्ति आज भी व्यवस्था की आलोचना के लिए प्रयोग की जाती है।
Example 2: ध्रुवस्वामिनी स्त्री प्रश्न की दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है?
ध्रुवस्वामिनी में नायिका अपने कायर पति के विरुद्ध विद्रोह करती है और अपने अधिकार तथा आत्मसम्मान की माँग करती है। यह नाटक स्त्री की स्वतंत्रता, विवाह और आत्मसम्मान के प्रश्न को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में उठाता है, इसलिए वह स्त्री प्रश्न की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
Example 3: आधे अधूरे की संरचनात्मक विशेषता क्या है?
आधे अधूरे में एक ही पुरुष पात्र कई रूपों में आता है, जो स्त्री के जीवन में आए विभिन्न पुरुषों का प्रतीक है। इस संरचना के माध्यम से मोहन राकेश ने मध्यवर्गीय परिवार के विघटन और स्त्री पुरुष संबंधों की जटिलता को दर्शाया है।
हिन्दी नाटक के चरण
| चरण | प्रमुख नाटककार | प्रमुख नाटक |
|---|---|---|
| भारतेन्दु युग | भारतेन्दु हरिश्चंद्र | भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी |
| प्रसाद युग | जयशंकर प्रसाद | चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी |
| आधुनिक | मोहन राकेश, धर्मवीर भारती | आधे अधूरे, अंधा युग |
| समकालीन | सफदर हाशमी, हबीब तनवीर | नुक्कड़ नाटक, लोक नाट्य |
प्रसाद के प्रमुख नाटक और विषय
| नाटक | केंद्रीय विषय | मुख्य पात्र |
|---|---|---|
| चंद्रगुप्त | राष्ट्रीय एकता, विदेशी आक्रमण का विरोध | चंद्रगुप्त, चाणक्य |
| स्कंदगुप्त | राष्ट्रीय रक्षा, हूण आक्रमण | स्कंदगुप्त |
| ध्रुवस्वामिनी | स्त्री स्वतंत्रता, आत्मसम्मान | ध्रुवस्वामिनी |
| अंधा युग | युद्ध की त्रासदी, नैतिक संकट | महाभारत के पात्र |
Diagrams (described)
नाटक के विकास का आरेख: भारतेन्दु से प्रसाद, प्रसाद से आधुनिक और आधुनिक से समकालीन नाटक तक की रेखा, जिसमें प्रत्येक चरण की प्रवृत्ति नीचे लिखी हो।
नाटक की संरचना का आरेख: कथानक, पात्र, संवाद, संघर्ष और मंचन को जोड़ने वाली व्यवस्था, जिसमें प्रत्येक तत्व की भूमिका लिखी हो।
Exam points
- भारतेन्दु हिन्दी नाटक के जनक माने जाते हैं, और अंधेर नगरी तथा भारत दुर्दशा उनके प्रमुख नाटक हैं।
- प्रसाद हिन्दी नाटक के शिखर हैं, और चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी उनके प्रमुख नाटक हैं।
- ध्रुवस्वामिनी स्त्री स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के प्रश्न का नाटक है।
- मोहन राकेश के प्रमुख नाटक आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे अधूरे हैं।
- अंधा युग धर्मवीर भारती का गीति नाट्य है, जो महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
- आधे अधूरे में एक ही पुरुष पात्र कई रूपों में आता है, जो स्त्री के जीवन के विभिन्न पुरुषों का प्रतीक है।
- नुक्कड़ नाटक सड़कों और जनसभाओं में प्रस्तुत किया जाता है, और सफदर हाशमी उसके प्रमुख रंगकर्मी हैं।
- हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य परंपरा को हिन्दी नाटक से जोड़ा।
Common mistakes
- भारतेन्दु को केवल कवि समझना भूल है, वे हिन्दी नाटक के जनक भी हैं।
- प्रसाद के नाटकों को केवल ऐतिहासिक समझना भूल है, उनमें आधुनिक प्रश्नों की टिप्पणी भी है।
- अंधा युग को केवल महाभारत की कथा समझना भूल है, वह युद्ध की त्रासदी और नैतिक संकट का नाटक भी है।
- नाटक को केवल पढ़ने की विधा समझना भूल है, वह मंचन की विधा भी है।
- नुक्कड़ नाटक को केवल मनोरंजन समझना भूल है, वह जनचेतना जगाने का माध्यम भी है।
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Quick revision: इस इकाई का सार यह है कि हिन्दी नाटक भारतेन्दु के समाज सुधार से शुरू होकर प्रसाद की ऐतिहासिक गंभीरता तक पहुँचा, आधुनिक काल में सामाजिक यथार्थ और प्रयोग की ओर मुड़ा, और समकालीन काल में जनचेतना तथा लोक परंपरा से जुड़ा। भारतेन्दु के नाटक, प्रसाद के नाटक, मोहन राकेश के नाटक और अंधा युग को रचनाकार तथा विषय के साथ याद करें। नाटक को पढ़ते समय उसकी मंचन योग्यता, संवाद और संघर्ष को भी ध्यान में रखें। किसी भी नाटक का नाम आते ही पहले उसका रचनाकार, फिर उसका चरण, और फिर उसका केंद्रीय विषय याद करें।
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