हिन्दी कविता
हिन्दी कविता
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आदिकालीन कविता
High weightageपृथ्वीराज रासो — रेवा तट; अमीर खुसरो — खुसरों की पहेलियाँ और मुकरियाँ; विद्यापति की पदावली (संपादक — डॉ. नरेन्द्र झा) — पद संख्या 1–25।
भक्तिकालीन कविता
High weightageकबीर (सं. — हजारी प्रसाद द्विवेदी) — पद संख्या 60–209; जायसी ग्रंथावली (सं. — रामचन्द्र शुक्ल) — नागमती वियोग खण्ड; सूरदास — भ्रमरगीत सार (सं. — रामचन्द्र शुक्ल) — पद संख्या 24–70; तुलसीदास — रामचरितमानस, उत्तर काण्ड; मीरा (सं. — विश्वनाथ त्रिपाठी) — प्रारंभ से 20 पद।
रीतिकालीन कविता
High weightageबिहारी सतसई (सं. — जगन्नाथ दास रत्नाकर) — दोहा संख्या 4–50; घनानन्द कवित्त (सं. — विश्वनाथ मिश्र) — कवित्त संख्या 4–30।
आधुनिक कविता
High weightageअयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध — प्रियप्रवास; मैथिलीशरण गुप्त — भारत भारती, साकेत (नवम् सर्ग); जयशंकर प्रसाद — आंसू, कामायनी (श्रद्धा, लज्जा, इड़ा); निराला — जुही की कली, जागो फिर एक बार, सरोजस्मृति, राम की शक्तिपूजा, कुकरमुत्ता, बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु; सुमित्रानंदन पंत — परिवर्तन, प्रथम रश्मि; महादेवी वर्मा — बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ, मै नीर भरी दुख की बदली, फिर विकल है प्राण मेरे, यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो, द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र; रामधारी सिंह दिनकर — उर्वशी (तृतीय अंक), रश्मिरथी; नागार्जुन — कालिदास, बादल को घिरते देखा है, अकाल और उसके बाद, खुरदरे पैर, शासन की बंदूक, मनुष्य हूँ; सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय — कलगी बाजरे की, यह दीप अकेला, हरी घास पर क्षण भर, असाध्यवीणा, कितनी नावों में कितनी बार; भवानीप्रसाद मिश्र — गीत फरोश, सतपुड़ा के जंगल; मुक्तिबोध — भूल गलती, ब्रह्मराक्षस, अंधेरे में; धूमिल — नक्सलवाड़ी, मोचीराम, अकाल दर्शन, रोटी और संसद।
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हिन्दी कविता हिन्दी साहित्य की आत्मा है। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक कविता ने हिन्दी समाज की भावनाओं, चिंतन और संघर्षों को अभिव्यक्ति दी है। कविता का इतिहास केवल छंदों और अलंकारों का इतिहास नहीं है, वह मनुष्य की संवेदना का इतिहास है। आदिकाल में कविता वीरता और धर्म की अभिव्यक्ति थी, भक्तिकाल में वह भक्ति और प्रेम की अभिव्यक्ति बनी, रीतिकाल में वह शृंगार और सौंदर्य की अभिव्यक्ति बनी, और आधुनिक काल में वह राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक यथार्थ, वैयक्तिक अनुभूति और प्रयोग की अभिव्यक्ति बनी। प्रत्येक काल की कविता की अपनी भाषा, अपनी लय और अपनी संवेदना है, और उन सबको एक साथ समझना ही हिन्दी कविता का अध्ययन है। इस इकाई में हम आदिकालीन, भक्तिकालीन, रीतिकालीन और आधुनिक कविता का अलग-अलग अध्ययन करेंगे। प्रत्येक काल की कविता को उसकी प्रमुख प्रवृत्ति, प्रमुख कवियों, प्रमुख रचनाओं, भाषा और शैली के संदर्भ में पढ़ेंगे। आधुनिक कविता को विशेष विस्तार से पढ़ेंगे, क्योंकि उसमें छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता जैसे कई आंदोलन आते हैं। इस इकाई को पढ़ते समय कवियों के नामों की सूची से अधिक उनकी काव्य दृष्टि को समझने पर बल दें, क्योंकि परीक्षा में प्रायः कवि, रचना, प्रवृत्ति और पंक्ति की विशेषता के संबंध पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
Learning objectives
- आदिकालीन कविता की प्रवृत्तियों, भाषाओं और प्रमुख कवियों को समझना।
- भक्तिकालीन कविता की धाराओं और प्रमुख कवियों की काव्य दृष्टि को जानना।
- रीतिकालीन कविता के वर्गों और प्रमुख कवियों की विशेषताओं का परिचय प्राप्त करना।
- आधुनिक कविता के आंदोलनों — छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता — को समझना।
- कविता की भाषा, बिंब, प्रतीक और लय के विकास का मूल्यांकन करना।
- काल, कवि और रचना के बीच संबंध स्थापित करके प्रश्नों का विश्लेषण करना।
Overview
हिन्दी कविता के इतिहास को चार कालों में देखने की परंपरा है। आदिकालीन कविता में वीरता, धर्म और लोक जीवन की प्रधानता है। उसकी भाषा अपभ्रंश से प्रभावित है, और उसमें डिंगल तथा पिंगल शैलियाँ मिलती हैं। भक्तिकालीन कविता में भक्ति, प्रेम और समता की प्रधानता है। उसकी भाषा अवधी और ब्रजभाषा है, और उसमें निर्गुण तथा सगुण दोनों धाराएँ मिलती हैं। रीतिकालीन कविता में शृंगार, अलंकार और रीति की प्रधानता है। उसकी भाषा ब्रजभाषा है, और उसमें रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त तीन वर्ग मिलते हैं। आधुनिक कविता में नवजागरण, राष्ट्रीय चेतना, यथार्थ, प्रयोग और वैयक्तिकता की प्रधानता है। उसकी भाषा खड़ी बोली है, और उसमें छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता और समकालीन कविता जैसे कई आंदोलन मिलते हैं। कविता के विकास को समझने के लिए भाषा के परिवर्तन को भी समझना आवश्यक है। आदिकाल में अपभ्रंश, भक्तिकाल और रीतिकाल में अवधी तथा ब्रजभाषा, और आधुनिक काल में खड़ी बोली का प्रयोग हुआ। यह परिवर्तन केवल भाषा का परिवर्तन नहीं है, वह संवेदना और समाज का परिवर्तन भी है। इस अवलोकन के बाद अब हम प्रत्येक काल की कविता को विस्तार से पढ़ेंगे।
आदिकालीन कविता
आदिकालीन कविता हिन्दी कविता की आरंभिक अवस्था है। इस काल की कविता में तीन प्रमुख प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। पहली प्रवृत्ति वीरगाथा की है, जिसमें राजाओं के युद्ध, वीरता और शौर्य का वर्णन है। रासो काव्य इसी प्रवृत्ति का प्रतिनिधि है। पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज की वीरता और प्रेम का वर्णन है, और उसकी भाषा में वीर रस तथा शृंगार रस का मेल है। दूसरी प्रवृत्ति धार्मिक और दार्शनिक कविता की है, जिसमें सिद्धों, नाथों और जैन कवियों की रचनाएँ आती हैं। सिद्धों की कविता में बाह्य आडंबर का विरोध, गुरु की महिमा और सहज साधना पर बल है। नाथों की कविता में योग, संयम और गुरु भक्ति की प्रधानता है। गोरखनाथ नाथ संप्रदाय के प्रमुख कवि हैं। जैन कवियों की रचनाओं में धार्मिक उपदेश, नीति और चरित का वर्णन है। तीसरी प्रवृत्ति शृंगार और लोक जीवन की कविता की है, जिसमें विद्यापति और अमीर खुसरो जैसे कवि आते हैं। विद्यापति की पदावली में राधा और कृष्ण के प्रेम का मधुर वर्णन है, जिसमें शृंगार और भक्ति का मेल है। अमीर खुसरो की रचनाओं में हिन्दी और फारसी का संगम है, और उनकी पहेलियों तथा मुकरियों में लोक जीवन की झलक है। आदिकालीन कविता की भाषा अभी स्थिर नहीं हुई थी, उसमें अपभ्रंश के तत्व थे, और डिंगल तथा पिंगल शैलियों का प्रयोग होता था। डिंगल में वीरता की ओजस्विता है, और पिंगल में मधुरता है। आदिकालीन कविता का महत्व यह है कि उसने हिन्दी कविता की नींव रखी, और उसमें वीरता, धर्म, प्रेम और लोक जीवन की वे प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं जो आगे के कालों में विकसित हुईं।
भक्तिकालीन कविता
भक्तिकालीन कविता हिन्दी कविता का स्वर्ण काल है। इस काल की कविता में भक्ति की दो धाराएँ हैं, निर्गुण और सगुण। निर्गुण धारा में ईश्वर को निराकार माना गया है। ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि कबीर ने जातिवाद, मूर्तिपूजा और बाह्य आडंबर का निर्भीक विरोध किया। कबीर की कविता में साखी, सबद और रमैनी प्रमुख रूप हैं। उनकी भाषा सधुक्कड़ी है, और उनकी उलटबाँसी में प्रतीकात्मकता है। कबीर की भक्ति में ज्ञान, प्रेम और सामाजिक समता का मेल है। प्रेमाश्रयी शाखा के कवि जायसी ने पद्मावत में प्रेम कथा के माध्यम से आध्यात्मिक प्रेम का वर्णन किया। जायसी की कविता में सूफी प्रेम की भावना है, जिसमें लौकिक प्रेम अलौकिक प्रेम का प्रतीक बन जाता है। सगुण धारा में ईश्वर को साकार माना गया है। रामाश्रयी शाखा के कवि तुलसीदास ने रामचरितमानस में राम के आदर्श जीवन का वर्णन किया। तुलसी की कविता में मर्यादा, लोकमंगल, भक्ति और नीति का समन्वय है। उनकी भाषा अवधी है, और दोहा तथा चौपाई उनके प्रमुख छंद हैं। कृष्णाश्रयी शाखा के कवि सूरदास ने सूरसागर में कृष्ण की बाल लीला और प्रेम लीला का वर्णन किया। सूर की कविता में वात्सल्य और शृंगार की मधुरता है, और उनकी भाषा ब्रजभाषा है। मीरा की कविता में कृष्ण के प्रति प्रेम की तीव्रता है, और रसखान की कविता में कृष्ण प्रेम की मधुरता है। रैदास की कविता में सामाजिक समता की चेतना है। भक्तिकालीन कविता की विशेषता यह है कि उसने भक्ति को जाति, वर्ण और लिंग की सीमाओं से मुक्त किया, और हिन्दी को लोकव्यापी बनाया। इस काल की कविता में लोकगीतों की लय, लोक जीवन की झलक और मानवीय प्रेम की गहराई मिलती है।
रीतिकालीन कविता
रीतिकालीन कविता में शृंगार, अलंकार और रीति की प्रधानता है। इस काल की कविता को तीन वर्गों में बाँटा जाता है। रीतिबद्ध कवियों ने लक्षण ग्रंथ लिखे, अर्थात काव्य के लक्षण बताए और उदाहरण के रूप में कविताएँ दीं। केशवदास इस वर्ग के प्रमुख कवि हैं, जिन्होंने कविप्रिया और रसिकप्रिया जैसे ग्रंथ लिखे। केशवदास को आचार्यत्व के लिए जाना जाता है, और उनकी कविता में अलंकारों की प्रधानता है। चिंतामणि, मतिराम और भूषण भी रीतिबद्ध वर्ग के कवि हैं। भूषण की कविता में वीर रस की प्रधानता है, और उन्होंने छत्रपति शिवाजी तथा छत्रसाल की वीरता का वर्णन किया है। रीतिसिद्ध कवियों ने लक्षण ग्रंथ नहीं लिखे, परंतु उनकी कविता में रीति के नियमों का पालन दिखाई देता है। बिहारी इस वर्ग के सबसे प्रसिद्ध कवि हैं। बिहारी सतसई में दोहों के माध्यम से शृंगार, नीति और भक्ति का वर्णन है। बिहारी के दोहों की विशेषता सूक्ष्मता, चमत्कार और अर्थगांभीर्य है। रीतिमुक्त कवियों ने रीति के बंधनों से मुक्त होकर स्वच्छंद प्रेम की कविता की। घनानंद इस वर्ग के प्रमुख कवि हैं। घनानंद की कविता में प्रेम की पीड़ा, वियोग और आत्मनिवेदन की तीव्रता है। उनकी भाषा में लाक्षणिकता और भावों की सूक्ष्मता है। ठाकुर और बोधा भी रीतिमुक्त वर्ग के कवि हैं। रीतिकालीन कविता की भाषा ब्रजभाषा है, जो इस काल में अपने उत्कर्ष पर पहुँची। इस काल की कविता में नायिका भेद, अलंकारों का चमत्कार और शृंगार की अतिशयता दिखाई देती है, परंतु साथ ही घनानंद जैसे कवियों में प्रेम की स्वच्छंद अभिव्यक्ति भी मिलती है। रीतिकालीन कविता की आलोचना यह की जाती है कि वह दरबारी और जीवन से दूर हो गई, परंतु उसकी उपलब्धि यह है कि उसने भाषा को मधुरता और अलंकारों को सूक्ष्मता दी।
आधुनिक कविता
आधुनिक कविता हिन्दी कविता का सबसे विविध और गतिशील काल है। इसकी शुरुआत भारतेन्दु युग से होती है, जिसमें देशभक्ति, समाज सुधार और नई शिक्षा की चेतना दिखाई देती है। भारतेन्दु की कविता में राष्ट्रीय भावना और समाज सुधार का मेल है। द्विवेदी युग में खड़ी बोली का प्रचलन हुआ और इतिवृत्तात्मकता, अर्थात घटनाओं का वर्णन, तथा नैतिक आदर्श की प्रधानता हुई। मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के प्रमुख कवि हैं, जिनकी कविता में राष्ट्रीयता, आदर्श और इतिहास की चेतना है। छायावाद आधुनिक कविता का एक महत्वपूर्ण आंदोलन है। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा छायावाद के चार स्तंभ हैं। प्रसाद की कविता में दर्शन, प्रकृति और मानवीय संवेदना का मेल है, और कामायनी उनकी महाकाव्यात्मक रचना है। निराला की कविता में विद्रोह, करुणा और प्रयोग की प्रधानता है, और उनकी भाषा में ओज तथा नवीनता है। पंत की कविता में प्रकृति प्रेम और सौंदर्य की प्रधानता है। महादेवी की कविता में वेदना, रहस्य और आत्मनिवेदन की प्रधानता है। प्रगतिवाद ने सामाजिक यथार्थ, शोषण का विरोध और जनचेतना पर बल दिया। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन प्रगतिवादी कविता के प्रमुख कवि हैं। प्रयोगवाद और नई कविता ने काव्य भाषा, बिंब और संरचना में नए प्रयोग किए। अज्ञेय प्रयोगवाद के प्रवर्तक माने जाते हैं, और उनकी कविता में वैयक्तिक अनुभूति तथा बौद्धिकता है। मुक्तिबोध की कविता में सामाजिक यथार्थ, आत्मसंघर्ष और फैंटेसी का मेल है। नई कविता में लघु मानव, अर्थात सामान्य मनुष्य, की अनुभूति केंद्रीय है। समकालीन कविता में दलित, स्त्री, आदिवासी और पर्यावरण के प्रश्न आए हैं। आधुनिक कविता की भाषा खड़ी बोली है, जिसमें मुक्त छंद, नई लय और नए बिंबों का प्रयोग हुआ है। आधुनिक कविता का अध्ययन करते समय प्रत्येक आंदोलन की प्रवृत्ति, प्रमुख कवि और काव्य भाषा को अलग-अलग याद करना आवश्यक है।
Key definitions
- छायावाद: आधुनिक हिन्दी कविता का आंदोलन, जिसमें प्रकृति प्रेम, रहस्यवाद, वैयक्तिक अनुभूति और कल्पना की प्रधानता है।
- प्रगतिवाद: सामाजिक यथार्थ, शोषण के विरोध और जनचेतना पर बल देने वाला काव्य आंदोलन, जो मार्क्सवादी चिंतन से प्रभावित था।
- प्रयोगवाद: काव्य भाषा, बिंब और संरचना में नए प्रयोगों पर बल देने वाला आंदोलन, जिसके प्रवर्तक अज्ञेय माने जाते हैं।
- नई कविता: प्रयोगवाद के बाद की कविता, जिसमें लघु मानव की अनुभूति, वैयक्तिकता और आधुनिक जीवन की जटिलता केंद्रीय है।
- सधुक्कड़ी भाषा: कबीर की भाषा, जिसमें कई बोलियों और भाषाओं के शब्द मिलते हैं।
- डिंगल: राजस्थानी की वीरगाथात्मक शैली, जिसमें वीरता की ओजस्विता है।
- पिंगल: ब्रजभाषा की मधुर शैली, जिसमें शृंगार और माधुर्य की प्रधानता है।
- लघु मानव: नई कविता की अवधारणा, जिसमें सामान्य मनुष्य की अनुभूति और जीवन की जटिलता केंद्रीय है।
Worked examples
Example 1: छायावाद और प्रगतिवाद में क्या अंतर है?
छायावाद में प्रकृति प्रेम, रहस्यवाद, वैयक्तिक अनुभूति और कल्पना की प्रधानता है, जबकि प्रगतिवाद में सामाजिक यथार्थ, शोषण का विरोध और जनचेतना की प्रधानता है। छायावाद का केंद्र वैयक्तिक संवेदना है, प्रगतिवाद का केंद्र सामाजिक संघर्ष है।
Example 2: कबीर और सूरदास की काव्य दृष्टि में क्या भेद है?
कबीर निर्गुण धारा के कवि हैं, वे निराकार ईश्वर और ज्ञान पर बल देते हैं तथा सामाजिक आडंबर का विरोध करते हैं। सूरदास सगुण धारा के कवि हैं, वे साकार कृष्ण की लीला का मधुर वर्णन करते हैं। दोनों की भक्ति प्रेम पर आधारित है, परंतु ईश्वर की अवधारणा भिन्न है।
Example 3: घनानंद को रीतिमुक्त क्यों कहा जाता है?
घनानंद ने लक्षण ग्रंथ नहीं लिखे और रीति के नियमों का पालन करने की बजाय स्वच्छंद प्रेम की कविता की। उनकी कविता में प्रेम की पीड़ा और वियोग की तीव्रता है, जो रीति के बंधनों से मुक्त है, इसलिए वे रीतिमुक्त कहलाते हैं।
हिन्दी कविता के काल और भाषा
| काल | प्रमुख भाषा | प्रमुख प्रवृत्ति |
|---|---|---|
| आदिकाल | अपभ्रंश प्रभावित हिन्दी | वीरता, धर्म, शृंगार |
| भक्तिकाल | अवधी, ब्रजभाषा | भक्ति, प्रेम, समता |
| रीतिकाल | ब्रजभाषा | शृंगार, अलंकार, रीति |
| आधुनिक काल | खड़ी बोली | राष्ट्रीयता, यथार्थ, प्रयोग |
आधुनिक कविता के आंदोलन
| आंदोलन | प्रमुख कवि | प्रमुख प्रवृत्ति |
|---|---|---|
| छायावाद | प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी | प्रकृति, रहस्य, वैयक्तिकता |
| प्रगतिवाद | नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल | सामाजिक यथार्थ, जनचेतना |
| प्रयोगवाद | अज्ञेय | भाषा और संरचना में प्रयोग |
| नई कविता | मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती | लघु मानव, आधुनिक जीवन |
Diagrams (described)
कविता के कालों का आरेख: आदिकाल से भक्तिकाल, भक्तिकाल से रीतिकाल और रीतिकाल से आधुनिक काल तक की रेखा, जिसमें प्रत्येक काल की भाषा नीचे लिखी हो।
भक्ति धाराओं का आरेख: निर्गुण और सगुण दो भाग, प्रत्येक के साथ प्रतिनिधि कवि और उनकी भाषा का नाम।
Exam points
- आदिकाल में डिंगल और पिंगल शैलियाँ महत्वपूर्ण हैं, डिंगल वीरता की है और पिंगल मधुरता की है।
- कबीर ज्ञानाश्रयी, जायसी प्रेमाश्रयी, तुलसी रामाश्रयी और सूर कृष्णाश्रयी धारा के प्रतिनिधि हैं।
- बिहारी रीतिसिद्ध, घनानंद रीतिमुक्त और केशवदास रीतिबद्ध वर्ग के कवि हैं।
- छायावाद के चार स्तंभ प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा हैं।
- प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय माने जाते हैं, और नई कविता में लघु मानव की अवधारणा केंद्रीय है।
- मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के प्रमुख कवि हैं, और भारतेन्दु आधुनिक कविता के आरंभ से जुड़े हैं।
- भक्तिकाल की भाषा अवधी और ब्रजभाषा है, रीतिकाल की भाषा ब्रजभाषा है, आधुनिक कविता की भाषा खड़ी बोली है।
- मुक्तिबोध की कविता में सामाजिक यथार्थ, आत्मसंघर्ष और फैंटेसी का मेल है।
Common mistakes
- कबीर को सगुण धारा में रखना भूल है, वे निर्गुण ज्ञानाश्रयी धारा के कवि हैं।
- बिहारी को रीतिबद्ध मानना भूल है, वे रीतिसिद्ध वर्ग के कवि हैं।
- छायावाद को केवल प्रकृति काव्य समझना भूल है, उसमें रहस्यवाद और वैयक्तिकता भी है।
- प्रयोगवाद और नई कविता को एक ही समझना भूल है, दोनों में प्रवृत्ति और काल का अंतर है।
- आदिकाल की भाषा को आधुनिक खड़ी बोली समझना भूल है, वह अपभ्रंश प्रभावित अवस्था थी।
Practice questions from this note (original practice — not official PYQs)
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Quick revision: इस इकाई का सार यह है कि हिन्दी कविता का इतिहास संवेदना का इतिहास है। आदिकाल में वीरता और धर्म, भक्तिकाल में भक्ति और प्रेम, रीतिकाल में शृंगार और रीति, और आधुनिक काल में राष्ट्रीयता, यथार्थ और प्रयोग प्रमुख रहे हैं। दोहराते समय प्रत्येक काल की भाषा, प्रमुख कवि और प्रवृत्ति को एक साथ याद करें। भक्ति की धाराएँ, रीति के वर्ग और आधुनिक आंदोलनों के भेद परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। किसी भी कवि का नाम आते ही पहले उसका काल, फिर उसकी धारा या आंदोलन, और फिर उसकी भाषा तथा विशेषता याद करें।
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