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रीतिकाल

Hindi (Code 20) · Unit 2 · ~11 min read · Original chapter

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रीतिकाल (लगभग 17वीं–19वीं शताब्दी) वह युग है जब कविता का केंद्र भक्ति से हटकर 'रीति' — काव्यशास्त्र के नियमों और शृंगार-वर्णन — पर आ गया। तीन प्रवृत्तियाँ पहचानी जाती हैं: रीतिबद्ध (केशव, बिहारी, देव — लक्षण-ग्रंथों के रचयिता), रीतिसिद्ध (बिहारी को कुछ विद्वान इस वर्ग में रखते हैं) और रीतिमुक्त (घनानंद, बोधा — स्वच्छंद प्रेम के कवि)। उदाहरण: बिहारी के दोहे में लक्षण और काव्य एक साथ हैं — 'सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर'।

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